बर्षों पहले हुआ था अंग्रेजों से आज़ाद देश हमारा।
मज़हबों और जातियों से कब आज़ाद होगा बस यही सोचता हूँ।
बाहर के दुश्मनों से लड़ना हमको आता है।
अपने कब छोड़ेंगे बार करना यही सोचता हूँ।
लड़ लेंगे मिलकर आतंकवाद से हम।
लेकिन ये नेता कब छोड़ेंगे गरीब को मारना यही सोचता हूँ।
ऐसा नहीँ सभी ईमानदार हों मेरे देश में।
लेकिन सभी कब छोड़ेंगे भ्रष्टाचार करना यही सोचता हूँ।
मौत ने तोह इक दिन सबको अपनाना ही है।
ज़िन्दगी कब करेगी अदब से ब्यबहार यही सोचता हूँ।
कब तक लिखता रहूंगा मैं यूँ ही बेवजह।
कब करेगा लिखा काम मेरा बस यही सोचता हूँ।
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