Monday, July 11, 2016

मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

क्यों है ज़िन्दगी में ये सूखा सा।।
मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

रात को जब मैं सोया था,,
सुंदर खावों में खोया था।।
उस वक़्त जो मुझे उठा दिया,,
तोह फिर एक सपना टूटा था।।
मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

इक हवा का झोंक जो आया था,,
तेरी याद भी साथ में लाया था।।
तुझको जो मैंने देखा था,,
मेरा दिल ही मुझसे छूटा था।।
मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

दोस्तों के संग मैं रहता था,,
गम भी ख़ुशी से सेहता था।।
जिस वक़्त मुझे यूँ तन्हा किया।।
तब खुशियों को मेरी लूटा था।।
मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

ज़िन्दगी का साथ निभाता रहा,,
नए रिश्ते बनाता रहा।।
दुखों में जब मुझे छोड़ दिया।।
उस वक़्त ये एहसास हुआ,,
के रिश्ता ही वोह झूठा था।।
मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

क्यों है ज़िन्दगी में ये सूखा सा।।
मेरा रब है मुझसे रूठा सा।।

Thursday, June 2, 2016

शायर

आज वोह जो इतराते हैं अपनी खूबसूरती पर इतना।।।
कल जब कीमत इंसानियत की पता चलेगी तोह रोयेंगे।।।

सैंकड़ों छेद थे उस गरीब के घर की छत में।।।
मज़बूर इतना था की बारिशों की दुआ करता था।।

वोह तमाम उम्र बनाता रहा महल अमीरों के।।
ताकि कुछ पल चैन से जी सके अपनी झोंपड़ी में।।

कौन कहता है खुदा एक है।।
यहाँ तोह दिनों के हिसाब से भगवान बंटे हैं। 

अक्सर लोग बुरा मान जाते हैं मेरा।।
जब उनको उनके अंदाज़ में जवाब दिया मैंने।।

सोया नहीँ हूँ चैन से इक जमाने से ऐ खुदा।।
कुछ पल के लिए बचपन ही वापिस कर दे मैं माँ की गोद में सो लूँ।।

सोचो कितने गरीब होते होंगे वोह लोग।।
जो चन्द पैसों के लिए अपना ज़मीर बेच लेते हैं।।

ना जाने लोग दुश्मन क्यों बनाते हैं।।
बर्बाद होने के लिए तोह ये इश्क़ ही बहुत है।।

ऐसा नहीँ हमें इश्क़ करना नहीँ आता।।
पर ऐसा कोई शख्स ही नहीँ था जो हमको बर्बाद कर जाता।।

ज़रिये और भी बहुत हैं बर्बाद होने के।।
ना जाने क्यों हर शख्स इश्क़ चुनता है।।

ऐ खुदा ले चल मुझे कहीं दूर वीरानों में।
ज़िन्दगी के शोर में अब जिया नहीं जाता।

तनहा ही निकला था घर से अपनी पहचान ढूंढने।।
टुटा उस वक़्त जब कुछ अपने ही पहचानने से इनकार कर गए।।

किसी ने मुझ से पूछा के इतनी क्यों पीते हो।।
हमने कहा कम्बखत जो मज़ा मादहोशियों में है वोह होश में कहाँ।।

उनसे केह दो ना आएं मेरी महफ़िल में।।
कम्बखत उनके दिए दर्द सुनाकर ही रुलाउंगा उनको।।

ना जाने कैसे भुला देते हैं लोग तेरी खुदाई को या रब।।
हमसे तोह तेरा बनाया एक शख्स नहीँ भुलाया जाता।।

टूट रहा हूँ हर पल इस ज़िन्दगी के सफर में।।
कम्बखत कोई तोह समझे मुझे दुआओं की नहीँ सहारे की जरूरत है।।

अपनी यादों से केह दो कि मेरी गली से ना गुज़रा करें।।
कम्बखत जमाना हो गया है मुझे चैन की नींद सोये हुए।।

अक्सर ये महफिलें भी रो देती हैं।।।
जब जब तेरे दिए दर्द सुनाता हूँ मैं।।।

कोई जिस्म बेचता है, कोई ज़मीर बेचता है।।
ये पैसे की भूख है कि मिटती ही नहीँ।।

ज़माना हो गया अपनों से रूबरू हुए।।।
सोचता हूँ फिर से कोई गुनाह करूँ।।

वोह हर रोज टूटता है।।
ताकि अपनों को जोड़ सके।।

वोह खुद भूखा रह के कमाता है हर रोज।।
ताकि वाकी सबके लिए पूरा हो सके।।

वोह अब पत्नी के हाथ का खाना माँ को चखाता भी नहीँ।।
जिसको कभी माँ के हाथ के सिवा कहीं स्वाद नहीँ आता था।।

Monday, February 15, 2016

कहाँ है

खा गये हैं सब बेच कर  ज़मीर को।
बिकता नहीं कहीं जो वोह ईमान कहाँ है।

मंदिर मस्जिद हर जगह दीखते हैं मुझे।
कोई वोह जगह बताये मिलता भगभान जहाँ है।

रास नहीं आई मुझे मतलब की ये दुनिया।
कोई तोह बतायेे कि ये शमशान कहाँ है।

लूट लेते हैं सब कुर्सी पे बैठ कर।
जो देश की खातिर मिट जाए वोह अरमान कहाँ हैं।

बहुत मिलते हैं लोग मुझे चलते फिरते यहाँ।
बस कोई इतना बता दे मिलते ईनसान कहाँ हैं।

नफ़रतें ही देखी यहाँ हर दिल में मैंने।
जहाँ सब मिलजुल कर रहते थे वोह हिन्दुस्तान कहाँ है।

Friday, February 12, 2016

जरूरत है तुम्हारी।

यादों के सहारे वक़त गुज़र सकता है।
ज़िन्दगी गुज़ारने के लिये मुझे जरूरत है तुम्हारी।

कुछ दूर तोह मैं तनहा भी चल सकता हूँ।
ज़िन्दगी भर चलने के लिए मुझे जरूरत है तुम्हारी।

अजनबियों के साथ बात तोह करता हूँ मैं।
पर हाल-ऐ-दिल सुनाने के लिए मुझे जरूरत है तुम्हारी।

ख़ुशी में तोह सारी दुनिया साथ होती है।
लेकिन गम बांटने के लिए मुझे जरूरत है तुम्हारी।

तनहाइयों में अक्सर मैं गुनगुना लेता हूँ।
मगर प्यार के गीत गाने के लिए मुझे जरूरत है तुम्हारी।

© चन्द्र शेखर मनकोटिया

Monday, February 8, 2016

दिल की बात

जब से देखा है मैंने तुझको यारा।
तब से बहका सा हूँ दिलदारा।
गुम सुम गुम सुम सा रहता हूँ।
हाल-ऐ-दिल सबसे कहता हूँ।
तेरी यादों में खोया खोया।
कई कई रातें मैं ना सोया।
तू क्यों लगता है सबसे प्यारा।
दिल ये बहका सा है दिलदारा।
जबसे देखा है तुझको यारा।

तेरा क्या है मुझसे नाता।
तू ही क्यों है दिल को भाता।
अपना हाल तुझे मैं बताऊँ।
तुझ संग प्यार के गीत गुनगुनाऊं।
साथ मिल जाए मुझे तुम्हारा।
जबसे देखा है तुझको यारा।
दिल ये बेहका है दिलदारा।

रातों की नींद उड़ाई है तुमने।
दिन का चैन चुराया है तुमने।
पहले तोह मेरा हाल ऐसा ना था।
अभी कुछ दिनों से जादू चलाया है तुमने।
अब तेरे बिन मुश्किल है मेरा गुज़ारा।
दिल ये बेहका सा है दिलदारा।
जबसे देखा है तुझको यारा।

अब हर जगह दिखती तू ही तू है।
हवा में भी जैसे तेरी खुशबू है।
तेरे बिना मुश्किल है अब जीना मेरा।
तूने चलाया कैसा जादू है।
दे दे मुझको थोडा सहारा।
दिल ये बेहका सा है दिलदारा।

जबसे देखा है तुमको यारा।
दिल ये बेहका है दिलदारा।

चन्द्र शेखर मनकोटिया

Saturday, April 6, 2013

KUCHH TOH BAAT HAI....

Kuchh toh baat hai.

Ankhon se kehte ho,
dil mein rehte ho,
kucch toh baat hai.

Door ja na sakun,
paas aa na sakun,
kucch toh baat hai.

Khawon mein aate ho,
sapno mein staate ho,
kucch toh baat hai.

Bahut yaad aate ho,
dil mein samate ho,
Kucch toh baat hai.

Chup reha bhi na jaye,
hal-e-dil keha bhi na jaye.
kucch toh baat hai.

Har pal teri hi baat krta hun
Tujh sang rehne ke khab bunta hun,
kucch toh baat hai.

Tere pass aane se khush hota hai,
door chali jaye tu toh ye dil rota hai.
Kucch toh baat hai.

 Chander Shekhar Mankotia.

Wednesday, March 27, 2013

kuchh lafaz meri kitab se.



 ये तनहाई का मौसम कंबखत गुज़रता ही नहीं,
 एक ज़माना हो ज्ञ मुझे नयी रुत का इंतज़ार करते करते.
2.   तन्हा जीना तो आता है मुझको।
पर कंबखत तेरी याद है के जीने नहीं देती।
3.   क्या फरमाइश करनी उस खुदा से बार बार शेखर’,
कंबखत मिलेगा तो वो ही जो तेरे मुक़द्दर में होगा।
4.   तन्हा ही हूँ मैं इस सफर ए ज़िंदगी में ए दोस्त,
कंबखत तू भी मेरे साथ हो चल कुछ पल ही सही।
5.   मरने के बाद कदर होती है शेखर’,
ज़िंदा तो साई बाबा भी अक्सर भूखे ही रहते थे।
6.   सफर-ए-ज़िंदगी में इतनी सी चाह है ऐ दोस्त,
कोई रोये न मेरी वजह से मेरे जीते जी
,
और कोई हँसे न मुझ पर मेरे जाने के बाद।
7.   सूखे पत्तों सी हो गयी है ये ज़िंदगी मेरी,
कंबखत जिस और की हवा चले
, उसी और चल देता हूँ।
8.   ज़िंदगी में जितनी भी दिल-लगी करनी है कर ले शेखर’,
पर कभी कोई ऐसा काम न करना कि खुद ही की नज़रों में गिर जाओ।
9.   तेरे बिना बड़ी बेरंग सी हो गयी है ये दुनिया मेरी,
तू एक बार फिर रंग भर दे मेरी ज़िंदगी में आकर।
10. मैं ही पागल था जो उसको अपना समझ बैठा,
वो तो कंबखत खावों में भी गैरों का निकला।
11. मैं तो सिरफ लफ़ज लिखा करता हूँ,
तेरी चाहत उसे गज़ल बना देती है।
12. यूं ही चंद लफ़ज लिख कर हम खुद को शायर समझ बैठे थे,
जो महफिल में बैठ कर दर्द-ए-दिल दुनिया का सुना तो खुद से ही शरमा गए।
13. कंबखत ज़िंदगी ने कुछ ऐसे ज़ख़म दिये हैं,
कि दाग तो भर गए पर दर्द अब भी बाकी है।
14. हालात मजबूर करते हैं शेखर’,
बरना कौन कंबखत बुरे काम करना चाहता है।