Wednesday, August 10, 2016

शायरी 2

तेरे अस्तित्व पर अक्सर मुझे शक होता है ऐ खुदा।।
जब भी किसी गरीब को भूख से मरते देखता हूँ।।😟

मुझे दफनाने से पहले मेरा दिल निकाल लेना।।
बरसों से इसमें बसता है कोई।।

पूरी तोह हो जाती शायद मेरी भी दुआएं।।।
पर उस तारे को टूटता देख कुछ माँगता भी तोह कैसे।।

तमाम उम्र जोड़ता रहा जो दूसरों को।।
किसी ने सहारा भी ना दिया जब वोह खुद बिखरा।।

हर रोज आकर छंट जाते हैं फिर।।
तेवर बादलों के भी आजकल सरकार जैसे हैं।।

मैं अभी तक ठीक से सिमटा भी नहीँ था।।।
और वोह फिर से आ गए हवाओं का झोंका बनकर।।।

ठिठुरा तोह बहुत था वोह उस बारिश वाली रात में।।
पर उसकी जमीन प्यासी और बच्चे भूखे थे।।😎

कितनी मुश्किलों से तिनका तिनका करके बनाया था उसने अपना आशियाना।।
उस हवा के झोंके ने पल भर में सब तवाह कर दिया।।

अब मेरी कलम भी मेरा साथ नहीँ देती।।
वोह जमाना और था जब मैं भी महफ़िलों को रुलाया करता था।।

वोह देश की खातिर लड़ते लड़ते भी आतंकवादी कहलाया।।
और लोग पलों में टोपी लगाकर ईमानदार हो गए।।😎😎

जी भर कर दीदार करले जब तक मैं हूँ।।
मुसाफिर हूँ ज़िन्दगी का ना जाने कल रहूँ ना रहूँ।।

कब तक रोकेंगे नीर को ये मिट्टी के बाँध।।
इक दिन तोह सैलाब आएगा जरूर।।

जरूरी नहीँ हर राह मन्ज़िल तक पहुंचे।।
कुछ किस्से अधूरे ही रहते हैं।।😑😑😑

ये कागजों की दुनिया है मैडम।।
यहाँ तुजुर्बे कौन देखता है।।

भूखे रहने से जो दुआएं कबूल होती।।
तोह शायद कोई रोटी की तलाश ना करता।।

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