चलते चलते सोचता हूँ लिखूं कुछ हालात ज़िन्दगी के।।
कुछ तेरे कुछ मेरे कुछ खयालात ज़िन्दगी के।।
हसरतें दिल में लाखों बसी हैं मेरे।।
बोलूँ जो मैं तोह कोई सुनता नहीँ।।
खाबों ख्यालों में मुझे कोई बुनता नहीँ।।
ना जाने कहाँ कहाँ उलझते हैं ये खाब ज़िन्दगी के।।
कुछ तेरे कुछ मेरे कुछ खयालात ज़िन्दगी के।।
रुकूँ तोह नज़र आते हैं काफिले ही काफिले मुझको।।
चलूं तोह संग मेरे कोई चलता नहीँ।।
खुद में ही उलझ गया हूँ कुछ इस तरह से।।
लाख कोशिशें करके भी सुलझता ही नहीँ।।
कभी कबार कलम से ही निकलते हैं अब ये जज़्बात ज़िन्दगी के।।
कुछ तेरे कुछ मेरे कुछ खयालात ज़िन्दगी के।।
बिकने को घूमता है यहाँ हर इंसान दुनिया का।।
कैसा ज़मीर है ये जो टिकता ही नहीँ।।
लड़खड़ा जाते हैं सभी यहाँ दुनिया की राह में।।
कोई बिरला ही शख्स हो जो फिसलता ही नहीँ।।
दुनिया में अच्छाइयों को कोई अपनाता भी तोह नहीँ।।
किस किस को दूँ मैं ये पैगाम ज़िन्दगी के।।
इक दिन मेरे साथ ही मर जायेंगे ये अरमान ज़िन्दगी के।।
इज़्ज़तों वाला श्रृंगार उतारकर जीते हैं लोग।।
इंसानियत और ज़मीर मारकर जीते हैं लोग।।
पैसे के लिए खुद को बेचकर।।
शराफतोँ वाले लिबास खरीदते हैं लोग।।
दिखावे के सँस्कारी अनेकों फिरते हैं।।
किस किस को सुनाऊं मैं हालात ज़िन्दगी के।।
कुछ तेरे कुछ मेरे कुछ खयालात ज़िन्दगी के।।
दहेज़ों और रिश्वतों के रिवाज़ चल रहे हैं।।
दिलों में नफरतों के साथ बच्चे पल रहे हैं।।
कौन सीखाता है अब जीने के सलीके।।
दुनिया में बदमाशियों के दौर चल रहे हैं।।
प्यार महोबत अब किताबों में ही रह गयी है।।
कैसे ब्यान करूँ ये संवाद ज़िन्दगी के।।
कुछ तेरे कुछ मेरे कुछ खयालात ज़िन्दगी के।।
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