प्यासा ना कोई रहे तोह कुछ बूंद पानी मांग बैठा।।
मर के भी ना मिटे वोह जिंदगानी मांग बैठा।।
देश की खातिर बहे वोह रक्त मांग बैठा।।
अपनों में जो गुज़रे वोह वक़्त मांग बैठा।।
जो देश से गरीबी मिटाए वोह खजाना मांग बैठा।।
भूखा ना कोई सोये तोह सबके लिये खाना मांग बैठा।।
गया था खुदा के घर मांगने को मैं।।
बेघर के लिए घर माँग बैठा, खुशियों भरी डगर मांग बैठा।।
Sunday, April 9, 2017
मांग बैठा
मैं और मेरी कलम 3
वक़्त बेवक़्त लिखवाता था अपने मन की बातों को।।
अब रोज रोज की परेशानी ही खत्म लो उस शायर को मार दिया मैंने।।
इश्क के किस्से तोह अक्सर अधूरे ही रहते हैं।।
सिर्फ मुक्कमल हो जाने का नाम ही प्यार नहीँ होता।।
ऐ खुशियों कभी वक़्त मिले तोह मुझसे भी समझौता कर लो।।
शायद कोई टुकड़ा रोटी का इसमें भी फेंका हो,,
इसी आस में सब कचरे केे डिब्बे बिखेर दिए उस गरीब ने।।
मैं भी लिखता कभी जज्बात-ए-इश्क।।
पर क्या करूँ दिल से पहले हालातों की कलम चल जाती है।।
जब पेट की भूख पानी पर भारी पड़ने लगी।।
वोह गरीब हाथ फैला बैठा।।
कभी करूँगा ब्यान इश्क के जज्बातों को।।
अभी लिख लेने दो दुनिया के हालातों को।।
मैं और मेरी कलम 2
आये हो इन गलियों में तोह थोड़ा सम्भल कर रहना।।
ये लफ़्ज़ों के लहजे में फ़ँसा लेते हैं जनाब।।
ये शायरों की महफ़िल है,
ये शब्दों में ही सारा जहां उलझा लेते हैं जनाब।।
तोड़ दिया आज मैंने वोह आशियाना।।
अब जब वोह परिंदा किसी और पेड़ पर जा बैठा तोह इंतज़ार किसका करूँ।।
तेरा नाम सुनते ही मेरे अल्फ़ाज़ों का उलझ जाना।।
बता ये इश्क़ नहीँ तोह और क्या है।।
वोह क्या जानता गुलाबों की महक।।
गरीब की चाहत तोह बस रोटी है जनाब।।
कभी तोह समझो उस कलम का दर्द।।
जिन शब्दों को पढ़कर तुम रो देते हो,
वोह खुद को मिटाकर लिखता है उन्हें।।
चाह नहीँ सुर्ख़ियों में आने की।।
किसी के काम आ जाएं इतना बहुत है।।
अपनी बहन को किसी ने कुछ कहा तोह उस से सहा ना गया।।
वोह जो दूसरों पर की हुयी टिप्पणी पर हंसता बहुत था।।
छोड़ क्या उम्मीद रखनी किसी से हमदर्दी की ऐ दोस्त।
लोग बेजुबानों को मार देते हैं एक वक़्त के खाने की खातिर।
कभी पलट कर देखो कोई पुरानी किताब।।
शायद किसी पन्ने में लिपटा मेरा नाम भी मिले।।
हर लफ्ज़ में दर्द छलकता है जनाब के।।
और कहते हैं कि इश्क़ था ही नहीँ।।
क्या समझेगा जमाना मेरे लफ़्ज़ों को ऐ दोस्त।
जब वोह ही नही समझा जिसकी खातिर लिखता हूँ मैं।।
मैं और मेरी कलम
दिलों को लुभाने का हुनर नहीँ जानता जनाब।।
कलम उठाकर हकीकत लिख देता हूँ अकसर।।
यहाँ दिनों के हिसाब से याद आता है खुदा।।
कौन कहता है मेरे देश में वेदभाव नहीँ होता।।
यकीन मानिए अब ये कलम नहीँ चलती।।
शब्दों का बोझ बढ़ने लगा हो जैसे।।
अल्फ़ाज़ों में बयां करदूँ मैं दुनिया के हालात।।
बता इस महफ़िल को चुप करायेगा कौन।।
ताउम्र बनाता रहा वोह घर लोगों के।।
बस खुद की एक छत बनाने की चाह में।।
#मजदूर_की_चाहत।।
ना जाने ये शायर इतना दर्द लाते कहाँ से हैं।।
हमसे तोह ना लिखा जाता एक लफ्ज़ भी गम-ए-ज़िन्दगी।।
यूँ तोह मुझे आदत नहीँ कुछ लिखने की।।
बस जब भी सोचता हूँ तुमको तोह कलम चलने लगती है।।
मझबूरियों के किस्से अब कैसे बयां करूँ।।
माँ के हाथ का खाना छोड़ कर आया हूँ ज़िन्दगी बसर करने।।
Sunday, September 11, 2016
भगत सिंह
ओस वेल्ले लड़ना केड़ा सौखा सी।
निक्की उमरे मरना केड़ा सौखा सी।
भरी जवानी बिच ही जा के लड़ गया सी।
घर देयाँ नू रौंदा छड सूली चढ़ गया सी।
हवावां दा रुख भी ओहने मोड़ेया होणा।
कच्च दे नाल पथरां नू भी तोड़ेया होणा।
पूरा देश ओस दिन रोया होणा।
भारत माँ ने जद अपणे लाडले नू खोया होणा।
खौरे ओहदे ते की चढ़ी खुमारी सी।
लखां उते ओह कल्ला ही भारी सी।
अपनेया ने ही किती ओदों गद्दारी सी।
गौरेयां दे नाल ला ली ठगां यारी सी।
जदों हंस के आखिर नू सूली चड़ेया होणा।
कईयाँ दा अरमान नाल ही मरेया होणा।
यम भी हाथ लाण तों डरेया होणा।
खोरे ओहना ने ऐना होंसला किथों करेया होणा।
मजबूर गरीबाँ दा हाथ फड़दा क्यों नहीँ।
बुराईयाँ दे नाल हुण लड़दा क्यों नहीँ।
किथे डुब गया कुज करदा क्यों नहीँ।
भगत सिंह बरगा सूरज हुण चड़दा क्यों नहीँ।
पैसा
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।
ज़िन्दगी की राहों पे बेहका देता है।
ना चाहते भी गलतियां करवा देता है।
भीड़ में भी इक दिन दौड़ायेगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।
अपनों को अपनों से लड़ा देता है।
दोस्तों से दुश्मन बना देता है।
माँ बाप को ठोकर मरवा देता है।
भाइयों को भाइयों से लड़वायेगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।
बुराईयों की राह पे चलना ये सिखाये।
गलत आदतों को पलना ये सिखाये।
पल पल में ये हमको बहकाये।
गुरुर में इक दिन डुबायेगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।
मज़बूरियों में गलत राहों पर चला देता है।
चोरी डकैती जैसे काम करवा देता है।
अपनों को दो निबाले खिलाने की खातिर।
सड़कों पर भीख तक मंगवाएगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।
बेटियाँ
फूलों की तरह खिलखिलाती हैं।
खुशबू की तरह मेहकाती हैं।
परियों का रूप लेकर आती हैं।
सबकी किस्मत में नहीं होती,
किसी किसी घर को ही रोशनाती हैं बेटियां।
दुखों में साथ कभी न ये छोड़ती।
अपनों से कभी मुंह नहीं मोड़ती।
अकेले में बैठ कर चाहे घंटों रो लें।
सामने हर दुःख हंस के जर लेती हैं बेटियां।
न चाहते हुए भी चुप रहती हैं।
अपनों की जुदाई हंस कर सहती हैं।
कोई दाग ना आये बाप की पगड़ी पर,
बस चुपचाप पराये घर की और चल देती हैं बेटियां।
दूर जब जाना है, तोह रोना ही है।
दस्तूर है दुनिया का, ऐसा होना ही है।
खुद चाहे कितने भी बुरे हालातों से गुजरें,
मुसीबत में माँ बाप का साथ निभा जाती हैँ बेटियां।
बुढ़ापे में आकर ये सहारा बन जाएँ।
अपने हाथों से खाना ये खिलाएं।
बेटे चाहे ठोकर भी मार दें।
अपना फ़र्ज़ निभा जाती हैँ बेटियां।