वक़्त बेवक़्त लिखवाता था अपने मन की बातों को।।
अब रोज रोज की परेशानी ही खत्म लो उस शायर को मार दिया मैंने।।
इश्क के किस्से तोह अक्सर अधूरे ही रहते हैं।।
सिर्फ मुक्कमल हो जाने का नाम ही प्यार नहीँ होता।।
ऐ खुशियों कभी वक़्त मिले तोह मुझसे भी समझौता कर लो।।
शायद कोई टुकड़ा रोटी का इसमें भी फेंका हो,,
इसी आस में सब कचरे केे डिब्बे बिखेर दिए उस गरीब ने।।
मैं भी लिखता कभी जज्बात-ए-इश्क।।
पर क्या करूँ दिल से पहले हालातों की कलम चल जाती है।।
जब पेट की भूख पानी पर भारी पड़ने लगी।।
वोह गरीब हाथ फैला बैठा।।
कभी करूँगा ब्यान इश्क के जज्बातों को।।
अभी लिख लेने दो दुनिया के हालातों को।।
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