Sunday, April 9, 2017

मैं और मेरी कलम 2

आये हो इन गलियों में तोह थोड़ा सम्भल कर रहना।।
ये लफ़्ज़ों के लहजे में फ़ँसा लेते हैं जनाब।।
ये शायरों की महफ़िल है,
ये शब्दों में ही सारा जहां उलझा लेते हैं जनाब।।

तोड़ दिया आज मैंने वोह आशियाना।।
अब जब वोह परिंदा किसी और पेड़ पर जा बैठा तोह इंतज़ार किसका करूँ।।

तेरा नाम सुनते ही मेरे अल्फ़ाज़ों का उलझ जाना।।
बता ये इश्क़ नहीँ तोह और क्या है।।

वोह क्या जानता गुलाबों की महक।।
गरीब की चाहत तोह बस रोटी है जनाब।।

कभी तोह समझो उस कलम का दर्द।।
जिन शब्दों को पढ़कर तुम रो देते हो,
वोह खुद को मिटाकर लिखता है उन्हें।।

चाह नहीँ सुर्ख़ियों में आने की।।
किसी के काम आ जाएं इतना बहुत है।।

अपनी बहन को किसी ने कुछ कहा तोह उस से सहा ना गया।।
वोह जो दूसरों पर की हुयी टिप्पणी पर हंसता बहुत था।।

छोड़ क्या उम्मीद रखनी किसी से हमदर्दी की ऐ दोस्त।
लोग बेजुबानों को मार देते हैं एक वक़्त के खाने की खातिर।

कभी पलट कर देखो कोई पुरानी किताब।।
शायद किसी पन्ने में लिपटा मेरा नाम भी मिले।।

हर लफ्ज़ में दर्द छलकता है जनाब के।।
और कहते हैं कि इश्क़ था ही नहीँ।।

क्या समझेगा जमाना मेरे लफ़्ज़ों को ऐ दोस्त।
जब वोह ही नही समझा जिसकी खातिर लिखता हूँ मैं।।

No comments:

Post a Comment