दिलों को लुभाने का हुनर नहीँ जानता जनाब।।
कलम उठाकर हकीकत लिख देता हूँ अकसर।।
यहाँ दिनों के हिसाब से याद आता है खुदा।।
कौन कहता है मेरे देश में वेदभाव नहीँ होता।।
यकीन मानिए अब ये कलम नहीँ चलती।।
शब्दों का बोझ बढ़ने लगा हो जैसे।।
अल्फ़ाज़ों में बयां करदूँ मैं दुनिया के हालात।।
बता इस महफ़िल को चुप करायेगा कौन।।
ताउम्र बनाता रहा वोह घर लोगों के।।
बस खुद की एक छत बनाने की चाह में।।
#मजदूर_की_चाहत।।
ना जाने ये शायर इतना दर्द लाते कहाँ से हैं।।
हमसे तोह ना लिखा जाता एक लफ्ज़ भी गम-ए-ज़िन्दगी।।
यूँ तोह मुझे आदत नहीँ कुछ लिखने की।।
बस जब भी सोचता हूँ तुमको तोह कलम चलने लगती है।।
मझबूरियों के किस्से अब कैसे बयां करूँ।।
माँ के हाथ का खाना छोड़ कर आया हूँ ज़िन्दगी बसर करने।।
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