इतने ना नज़र आएंगे तुमको मेरे ये ऐब।।
कभी खुद की बातों को भी तोड़ मरोड़कर तोह देखो।।
खत्म हो जाएं दुनिया की तमाम ये नफ़रतें।।
कभी खुदको अच्छाई की तरफ मोड़कर तोह देखो।।
एक निबाला भी व्यर्थ ना फेंकोगे तुम यूँ।।
कभी खुदको उस किसान की तरह तोड़कर तोह देखो।।
गरीबी का एहसास हो ही जाएगा।।
एक वक़्त के खाने लिए कभी दूसरों के सामने हाथ जोड़कर तोह देखो।।
खूब भायेगी फिर तुमको मखमलों की नींद।।
कभी एक रात फुटपाथ पर ठंड की चादर ओढ़ कर तोह देखो।।
भूल जाओगे एक पैसा भी बेइमानी का लेना।।
कभी अपने अंदर के इंसान को जखजोड़कर तोह देखो।।
अच्छे बुरे का एहसास खुद ही होने लगेगा।।
कभी नोटों और वोटों की राजनीती छोड़कर तोह देखो।।
एक दिन भारत समृद्ध हो ही जायेगा।।
तुम भी ईमानदारी की राह पर दौड़कर तोह देखो।।
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