Sunday, April 9, 2017

शायर 3

मैं अपने गमों को छिपाकर मुस्कुराता हूँ।।
बहल जाए कोई रूह इसलिए गुनगुनाता हूँ।।
हकीकत हालातों की मेरी आँखें बयान करती हैं।।
ये आंसू छलक ना जाए तोह चहरे को छिपाता हूँ।।

खुद को हर रोज पीसता हूँ वक़्त की चक्की में।।
बस अपने ख्यालों को महीन करने के लिए।।

अकसर रुक जाता हूँ इन सरहदों को देखकर।।
परिन्दों की तरह बेख़ौफ़ उड़ना हमको नहीँ आया।।

आँखों से पढ़लो दिल की गहराईयों के राज।।
मेरी कलम अकसर हकीकत बयाँ नहीँ करती।।

अच्छी तरह से वाकिफ हूँ मैं कलम के हुनर से।।
मेरे दर्दों पर अकसर वाह वाह करते हैं लोग।।

कुछ फीका पड़ गया है मेरी कलम का वजूद।।
अब पहले के जैसे खयालात नहीँ आते।।

असल मंज़िल तोह आखिर मौत ही है।।
ना जाने क्यों बेहक जाता हूँ ज़िन्दगी हर बार देख कर तुझको।।

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