Sunday, July 29, 2018

पूछिये।।

कभी टूटती नहीं हैं सोच और ख्यालों की बंदिशें।।
और बांध के रख नहीं सकते चाहे जंजीरों से पूछिए।।

घर से निकल आये हो तोह कट ही जायेगा सफर।।
लेकिन कितनी मुश्किल थी डगर राहगीरों से पूछिए।।

यूं ही बेवजह के हैं दुनिया में भेदभाव,,
लहू सबका एक सा है चाहे शमशीरों से पूछिए।।

पाने की हो चाह तोह कुछ भी नहीं है मुश्किल।।
कैसे पा लेता है कोई खुदा ये फकीरों से पूछिए।।

मेहनतें तोह अक्सर रंग ला ही जाती हैं।।
कितनों ने पाया है मुक़दरों से बढ़ के ये तकदीरों से पूछिए।।

तेरी दुनिया में या रब सब बनते हैं फरिश्ते।।
कौन कितना है गुनहगार मुखबिरों से पूछिए।।

सब बदलता है वक़्त के बदलने से।।
तुम बदले हो कितना ये पुरानी तस्वीरों से पूछिए।।

मरने पर तोह मिलेगी बस दो गज ही जमीन।।
साथ लेकर कौन गया है चाहे जागीरों से पूछिए।।

Thursday, May 18, 2017

बता इस से बढ़कर चाहूं तोह क्या।।

फूलों की महक,
पंछियों की चहक।।
घने घने जाड़,
ऊंचे ऊंचे पहाड़।।
बादलों की गड़गड़ाहट,
बहते झरनों की आहट।।
खुला आसमान और हाथों में जाम।।
बता इस से बढ़कर कोई चाहेगा क्या।।

महबूबा का हाथों में हाथ।।
वोह हल्की बरसात।।
नज़रों का मिलना,,
चहरों का खिलना।।
गुमसुम सा शहर,,
और वोह महोबत की बात।।
बता इस से बढ़कर कोई चाहे तोह क्या।।

दोस्तों से मुलाकातें, वोह काली घनी रातें।।
खुशदिल समा, वोह महफ़िल जवां।।
स्वादिष्ट सा खाना,, वोह गाना बजाना।।
शायरों का मिलना,, वोह शब्दों का भिड़ना।।
इश्क के जज्वात और वोह पहली मुलाकात।।
बता इस से बढ़कर कोई चाहे तोह क्या।।

माँ के हाथ का खाना,, गांव की गलियों में गुनगुनाना।।
मक्की की रोटी,, वोह लस्सी का गिलास।।
माँ का दुलार,, वोह प्यार का एहसास।।
रेहड़ू, कड़ु, पलदे का स्वाद,, और ताज़े गुड़ की मिठास।।
बता इस से बढ़कर कोई चाहे भी तोह क्या।।

Monday, May 1, 2017

बस यही सोचता हूँ।।

बर्षों पहले हुआ था अंग्रेजों से आज़ाद देश हमारा।
मज़हबों और जातियों से कब आज़ाद होगा बस यही सोचता हूँ।

बाहर के दुश्मनों से लड़ना हमको आता है।
अपने कब छोड़ेंगे बार करना यही सोचता हूँ।

लड़ लेंगे मिलकर आतंकवाद से हम।
लेकिन ये नेता कब छोड़ेंगे गरीब को मारना यही सोचता हूँ।

ऐसा नहीँ सभी ईमानदार हों मेरे देश में।
लेकिन सभी कब छोड़ेंगे भ्रष्टाचार करना यही सोचता हूँ।

मौत ने तोह इक दिन सबको अपनाना ही है।
ज़िन्दगी कब करेगी अदब से ब्यबहार यही सोचता हूँ।

कब तक लिखता रहूंगा मैं यूँ ही बेवजह।
कब करेगा लिखा काम मेरा बस यही सोचता हूँ।

Sunday, April 9, 2017

क्या लिखूं

कभी सोचता हूँ ये लिखूं कभी सोचता हूँ वोह लिखूं।।
पढ़कर थोड़ा तुम भी सोचो आखिर में मैं जो लिखूं।।

तुम महबूबा के होंठों के रंगों को लिखना।।
मैं बच्चों में खिलखिलाती उमंगों को लिखूं।।

कभी सोचता हूँ टपकती हुयी वोह झोंपड़ी को लिखूं।।
या आसमान को निहारते उस किसान की उम्मीदों को लिखूं।।

जो खुशहाली की तरफ ले जाए ऐसी कोई राह लिखूं।।
या अपनों से मिलने की एक सैनिक की चाह लिखूं।।

धर्मों जातियों के नाम पर बांटने वाली कुरीतों को लिखूं।।
या त्योहारों में बंटने वाली हर्षोउल्लास की रीतों को लिखूं।।

कभी सूखे में लिपटे उस बच्चे की प्यास को लिखूं।।
या बाढ़ में डूबते अपने घर को देखने का एहसास लिखूं।।

दहेज की खातिर अपनी बेटी को ना व्याह पाया जो उस गरीब की घुटन को लिखूं।।
या फुटपाथ पर कांपते हुए उस बेबस के लिए तपन लिखूं।।

दीमक बनकर देश को लूटती सरकार को लिखूं।।
किसी ईमानदार के गले का फंदा बने भ्र्ष्टाचार को लिखूं।।

शायर 3

मैं अपने गमों को छिपाकर मुस्कुराता हूँ।।
बहल जाए कोई रूह इसलिए गुनगुनाता हूँ।।
हकीकत हालातों की मेरी आँखें बयान करती हैं।।
ये आंसू छलक ना जाए तोह चहरे को छिपाता हूँ।।

खुद को हर रोज पीसता हूँ वक़्त की चक्की में।।
बस अपने ख्यालों को महीन करने के लिए।।

अकसर रुक जाता हूँ इन सरहदों को देखकर।।
परिन्दों की तरह बेख़ौफ़ उड़ना हमको नहीँ आया।।

आँखों से पढ़लो दिल की गहराईयों के राज।।
मेरी कलम अकसर हकीकत बयाँ नहीँ करती।।

अच्छी तरह से वाकिफ हूँ मैं कलम के हुनर से।।
मेरे दर्दों पर अकसर वाह वाह करते हैं लोग।।

कुछ फीका पड़ गया है मेरी कलम का वजूद।।
अब पहले के जैसे खयालात नहीँ आते।।

असल मंज़िल तोह आखिर मौत ही है।।
ना जाने क्यों बेहक जाता हूँ ज़िन्दगी हर बार देख कर तुझको।।

किसान

वोह बारिशों की दुआएं।।
वोह धूप में कड़ी मेहनत।।
वोह जाग के काटी रातें।।
वोह छत से टपकती बरसातें।।
फिर भी खुदा के रंगों में रंग जाना आसान तोह नहीँ।।
आखिर किसान हो जाना आसान तोह नहीँ।।

वोह सूखे का खौफ।।
वोह कोहरे की मार।।
वोह बाढ़ के आने का डर।।
सब सहकर भी पसीना बहाना आसान तोह नहीँ।।
आखिर किसान हो जाना आसान तोह नहीँ।।

वोह पैसे के लाले।।
वोह मंडी की लंबी लाइने।।
वोह मोल ना मिलने का दर्द।।
फिर भी घर की जरूरतों के लिए खुद को भूल जाना आसान तोह नहीँ।।
आखिर किसान हो जाना आसान तोह नहीँ।।

वोह उजड़े हुए खेत।।
वोह सूखी उड़ती रेत।।
दिनों में ही हरे भरे से वीरान हो जाना।।
जो किस्मतों में था मिल गया ये खुद को समझाना आसान तोह नहीँ।।
आखिर किसान हो जाना आसान तोह नहीँ।।

वोह बैंकों की किश्तें।।
मुश्किलों में टूटते रिश्ते।।
मझबूरियों में सबकुछ यूँ ही छोड़ के मर जाना आसान तोह नहीँ।।
आखिर किसान हो जाना आसान तोह नहीँ।।

शायर 2

इतने ना नज़र आएंगे तुमको मेरे ये ऐब।।
कभी खुद की बातों को भी तोड़ मरोड़कर तोह देखो।।

खत्म हो जाएं दुनिया की तमाम ये नफ़रतें।।
कभी खुदको अच्छाई की तरफ मोड़कर तोह देखो।।

एक निबाला भी व्यर्थ ना फेंकोगे तुम यूँ।।
कभी खुदको उस किसान की तरह तोड़कर तोह देखो।।

गरीबी का एहसास हो ही जाएगा।।
एक वक़्त के खाने लिए कभी दूसरों के सामने हाथ जोड़कर तोह देखो।।

खूब भायेगी फिर तुमको मखमलों की नींद।।
कभी एक रात फुटपाथ पर ठंड की चादर ओढ़ कर तोह देखो।।

भूल जाओगे एक पैसा भी बेइमानी का लेना।।
कभी अपने अंदर के इंसान को जखजोड़कर तोह देखो।।

अच्छे बुरे का एहसास खुद ही होने लगेगा।।
कभी नोटों और वोटों की राजनीती छोड़कर तोह देखो।।

एक दिन भारत समृद्ध हो ही जायेगा।।
तुम भी ईमानदारी की राह पर दौड़कर तोह देखो।।

मांग बैठा

प्यासा ना कोई रहे तोह कुछ बूंद पानी मांग बैठा।।
मर के भी ना मिटे वोह जिंदगानी मांग बैठा।।
देश की खातिर बहे वोह रक्त मांग बैठा।।
अपनों में जो गुज़रे वोह वक़्त मांग बैठा।।
जो देश से गरीबी मिटाए वोह खजाना मांग बैठा।।
भूखा ना कोई सोये तोह सबके लिये खाना मांग बैठा।।
गया था खुदा के घर मांगने को मैं।।
बेघर के लिए घर माँग बैठा, खुशियों भरी डगर मांग बैठा।।

मैं और मेरी कलम 3

वक़्त बेवक़्त लिखवाता था अपने मन की बातों को।।
अब रोज रोज की परेशानी ही खत्म लो उस शायर को मार दिया मैंने।।

इश्क के किस्से तोह अक्सर अधूरे ही रहते हैं।।
सिर्फ मुक्कमल हो जाने का नाम ही प्यार नहीँ होता।।

ऐ खुशियों कभी वक़्त मिले तोह मुझसे भी समझौता कर लो।।

शायद कोई टुकड़ा रोटी का इसमें भी फेंका हो,,
इसी आस में सब कचरे केे डिब्बे बिखेर दिए उस गरीब ने।।

मैं भी लिखता कभी जज्बात-ए-इश्क।।
पर क्या करूँ दिल से पहले हालातों की कलम चल जाती है।।

जब पेट की भूख पानी पर भारी पड़ने लगी।।
वोह गरीब हाथ फैला बैठा।।

कभी करूँगा ब्यान इश्क के जज्बातों को।।
अभी लिख लेने दो दुनिया के हालातों को।।

मैं और मेरी कलम 2

आये हो इन गलियों में तोह थोड़ा सम्भल कर रहना।।
ये लफ़्ज़ों के लहजे में फ़ँसा लेते हैं जनाब।।
ये शायरों की महफ़िल है,
ये शब्दों में ही सारा जहां उलझा लेते हैं जनाब।।

तोड़ दिया आज मैंने वोह आशियाना।।
अब जब वोह परिंदा किसी और पेड़ पर जा बैठा तोह इंतज़ार किसका करूँ।।

तेरा नाम सुनते ही मेरे अल्फ़ाज़ों का उलझ जाना।।
बता ये इश्क़ नहीँ तोह और क्या है।।

वोह क्या जानता गुलाबों की महक।।
गरीब की चाहत तोह बस रोटी है जनाब।।

कभी तोह समझो उस कलम का दर्द।।
जिन शब्दों को पढ़कर तुम रो देते हो,
वोह खुद को मिटाकर लिखता है उन्हें।।

चाह नहीँ सुर्ख़ियों में आने की।।
किसी के काम आ जाएं इतना बहुत है।।

अपनी बहन को किसी ने कुछ कहा तोह उस से सहा ना गया।।
वोह जो दूसरों पर की हुयी टिप्पणी पर हंसता बहुत था।।

छोड़ क्या उम्मीद रखनी किसी से हमदर्दी की ऐ दोस्त।
लोग बेजुबानों को मार देते हैं एक वक़्त के खाने की खातिर।

कभी पलट कर देखो कोई पुरानी किताब।।
शायद किसी पन्ने में लिपटा मेरा नाम भी मिले।।

हर लफ्ज़ में दर्द छलकता है जनाब के।।
और कहते हैं कि इश्क़ था ही नहीँ।।

क्या समझेगा जमाना मेरे लफ़्ज़ों को ऐ दोस्त।
जब वोह ही नही समझा जिसकी खातिर लिखता हूँ मैं।।

मैं और मेरी कलम

दिलों को लुभाने का हुनर नहीँ जानता जनाब।।
कलम उठाकर हकीकत लिख देता हूँ अकसर।।

यहाँ दिनों के हिसाब से याद आता है खुदा।।
कौन कहता है मेरे देश में वेदभाव नहीँ होता।।

यकीन मानिए अब ये कलम नहीँ चलती।।
शब्दों का बोझ बढ़ने लगा हो जैसे।।

अल्फ़ाज़ों में बयां करदूँ मैं दुनिया के हालात।।
बता इस महफ़िल को चुप करायेगा कौन।।

ताउम्र बनाता रहा वोह घर लोगों के।।
बस खुद की एक छत बनाने की चाह में।।

#मजदूर_की_चाहत।।

ना जाने ये शायर इतना दर्द लाते कहाँ से हैं।।
हमसे तोह ना लिखा जाता एक लफ्ज़ भी गम-ए-ज़िन्दगी।।

यूँ तोह मुझे आदत नहीँ कुछ लिखने की।।
बस जब भी सोचता हूँ तुमको तोह कलम चलने लगती है।।

मझबूरियों के किस्से अब कैसे बयां करूँ।।
माँ के हाथ का खाना छोड़ कर आया हूँ ज़िन्दगी बसर करने।।

Sunday, September 11, 2016

भगत सिंह

ओस वेल्ले लड़ना केड़ा सौखा सी।
निक्की उमरे मरना केड़ा सौखा सी।
भरी जवानी बिच ही जा के लड़ गया सी।
घर देयाँ नू रौंदा छड सूली चढ़ गया सी।

हवावां दा रुख भी ओहने मोड़ेया होणा।
कच्च दे नाल पथरां नू भी तोड़ेया होणा।
पूरा देश ओस दिन रोया होणा।
भारत माँ ने जद अपणे लाडले नू खोया होणा।

खौरे ओहदे ते की चढ़ी खुमारी सी।
लखां उते ओह कल्ला ही भारी सी।
अपनेया ने ही किती ओदों गद्दारी सी।
गौरेयां दे नाल ला ली ठगां यारी सी।

जदों हंस के आखिर नू सूली चड़ेया होणा।
कईयाँ दा अरमान नाल ही मरेया होणा।
यम भी हाथ लाण तों डरेया होणा।
खोरे ओहना ने ऐना होंसला किथों करेया होणा।

मजबूर गरीबाँ दा हाथ फड़दा क्यों नहीँ।
बुराईयाँ दे नाल हुण लड़दा क्यों नहीँ।
किथे डुब गया कुज करदा क्यों नहीँ।
भगत सिंह बरगा सूरज हुण चड़दा क्यों नहीँ।

पैसा

पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।

ज़िन्दगी की राहों पे बेहका देता है।
ना चाहते भी गलतियां करवा देता है।
भीड़ में भी इक दिन दौड़ायेगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।

अपनों को अपनों से लड़ा देता है।
दोस्तों से दुश्मन बना देता है।
माँ बाप को ठोकर मरवा देता है।
भाइयों को भाइयों से लड़वायेगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।

बुराईयों की राह पे चलना ये सिखाये।
गलत आदतों को पलना ये सिखाये।
पल पल में ये हमको बहकाये।
गुरुर में इक दिन डुबायेगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।

मज़बूरियों में गलत राहों पर चला देता है।
चोरी डकैती जैसे काम करवा देता है।
अपनों को दो निबाले खिलाने की खातिर।
सड़कों पर भीख तक मंगवाएगा ही।
पैसा है अपना रंग तोह दिखायेगा ही।

बेटियाँ

फूलों की तरह खिलखिलाती हैं।
खुशबू की तरह मेहकाती हैं।
परियों का रूप लेकर आती हैं।
सबकी किस्मत में नहीं होती,
किसी किसी घर को ही रोशनाती हैं बेटियां।

दुखों में साथ कभी न ये छोड़ती।
अपनों से कभी मुंह नहीं मोड़ती।
अकेले में बैठ कर चाहे घंटों रो लें।
सामने हर दुःख हंस के जर लेती हैं बेटियां।

न चाहते हुए भी चुप रहती हैं।
अपनों की जुदाई हंस कर सहती हैं।
कोई दाग ना आये बाप की पगड़ी पर,
बस चुपचाप पराये घर की और चल देती हैं बेटियां।

दूर जब जाना है, तोह रोना ही है।
दस्तूर है दुनिया का, ऐसा होना ही है।
खुद चाहे कितने भी बुरे हालातों से गुजरें,
मुसीबत में माँ बाप का साथ निभा जाती हैँ बेटियां।

बुढ़ापे में आकर ये सहारा बन जाएँ।
अपने हाथों से खाना ये खिलाएं।
बेटे चाहे ठोकर भी मार दें।
अपना फ़र्ज़ निभा जाती हैँ बेटियां।

Thursday, September 8, 2016

शायरी 4

खुद गिर गिर कर मुझे चलना सिखाया है।।
फिसलूं जो कभी तोह सम्भलना सिखाया है।।
बहुत हुनर वाला बनाया है मुझे मेरे पापा ने।।
कैसे भी हालात हों मुझे पलना सिखाया है।।

फिसलते देखे मैंने आज वोह चेहरों के नूर पर।।
वोह जो कल तक बात समझदारियों की करते थे।।

खामोश सी है इक अरसे से मेरी कलम।।
ज़िन्दगी बस इतने ही दर्द दिए थे क्या मुझे।।

आगोश में अपनी कोई समेटता ही नहीँ।।
कुछ इस तरह से वक़्त ने बिखेरा है मुझे।।

नसीबों के किस्से अब कैसे ब्यान करूँ।।
वोह उसको भी टटोलता है जो तुम फेंक आते हो।।

ज़िन्दगी में आये हो तोह थोड़ा अदब से चलना ऐ दोस्त।।
यहाँ कदम कदम पर सौदागर मिलेंगे खरीदने को तुमको।।

कमाल के ब्यापारी मिले ज़िन्दगी तेरे सफर में।।
कोई खुद को बेचता है तोह कोई बिक जाता है यहाँ।।

सब कहने की बातें हैं जनाब कि मेहनतें रंग लाती हैं।।
वोह धूप में उगाता है फिर भी गरीब है।।
और वोह ac में बेच कर भी अमीर हो गए।।

सीखा है मैंने।।

वोह भूखे को रोटी।।
वोह बेघर को घर।।
वोह कड़कती ठंड में कपड़ा।।
वोह तपती धूप में छाया।।
और वोह गरीबी में माया।।
ना जाने कितनी दुआएं मांगी हैं मैंने।।

वोह खिलखिलाते फूल।।
वोह लहलहाते खेत।।
वोह नाचते मोर।।
वोह गाती हुयी कोयलें।।
वोह टिमटिमाते हुए तारे।।
और बारिशों के नजारे।।
ना जाने कितनी फिजायें देखी हैं मैंने।।

वोह गरजते बादल।।
वोह बहती हुयी नदियाँ।।
वोह कलकलाते झरने।।
वोह अचल अडिग पहाड़।।
वोह घने बृक्ष और जाड़।।
और वोह ठंडी हवाएं महसूस की हैं मैंने।।

अपनों से दूर जाना।।
वोह रूठते को मनाना।।
तनहाइयों में रोना।।
रात रात भर ना सोना।।
वोह आसमान को निहारना।।
खावों में तुझको पुकारना।।
और ना जाने कितनी सजाएं पायी हैं मैंने।।

दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

बड़ा लगदा है छैल तेरा हसना।।
गल दिले आली लगा तिज्जो दसना।।
मिंजो लगदी तू बाँकी बड़ी गोरिये।।
दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

तँग काला सूट जालु भी पाँदी तू।।
जान कडी लैंदी लके मटकांदी तू।।
कियाँ दसां तिज्जो मेरी कमजोरिये।।
दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

हाल दिले आला कियाँ तिज्जो दसां हुण।।
कल्ला बेयी तिज्जो याद करी हसां हुण।।
तार दिले आले कियाँ भला जोड़िये।।
दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

तेरी याद मिंजो हर पल आंदी हुण।।
तू राती सुपनेयाँ च आयी करी सतान्दी हुण
दिल कियाँ तेरे दिल कन्ने जोड़िये।।
कुछ तां दस हुण मेरी कमजोरिये।।
दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

तिज्जो अपनी बनाना हुण चांदा मैं।।
तेरे कन्ने उम्र बिताना हुण चांदा मैं।।
मेरे मापेयां जो बनायी लै तू अपने सोरिये।।
दिल लुट्टया तू पहाड़ां दिए छोरिये।।

© चन्द्र शेखर मनकोटिया

Friday, August 19, 2016

शायरी 3

कमाल के हैं इंसान यहाँ दुनिया में।।
जिस पेड़ की छाँव में बैठ जाता था धूप में थक कर।।
उसी पेड़ को आज जलाता है तपने के लिए।।

मुझको आज भी वोही पसन्द है।।
बस उसका ही नज़रिया बदल गया।।

वक़्त के साथ हालात तोह बदल गए।।
एक मैं नहीँ बदला एक मेरी पसन्द नहीँ बदली।।

यूँ ना सताया कर तू बात बात पर ऐ ज़िन्दगी।।
मैं जो रूठा तोह फिर ना मानूँगा कभी।।

टूट जाना तोह मुक्कदर था उस शाख का।।
आँधियाँ तोह महज एक जरिया बन गयीं।।

छोड़ क्या बात करनी इंसानियत की ऐ दोस्त।।
यहाँ मजहबों के हिसाब से नज़रिये बदल जाते हैं।।

पतझड़ों में तोह आखिर टूटना ही था।।
जो आंधियों में बिखरा तोह बुरा क्यों मानू।।

अक्सर टूट जाते हैं वोह लोग।।
जो दूसरों को बिखरने नहीँ देते।।

उम्मीद है नई रुत आएगी बहारों के साथ।।
वैसे तोह समा ये भी हसीन है।।

हमेशा तोह नहीँ रहते बगानों में फूल।।
जो पतझड़ आये तोह साथ चलना मेरे।।

घटा बनकर कभी तोह छाओ रे बदरा।।
कहीं से उम्मीद कोई जगाओ रे बदरा।।
पूरे जहाँ की नफ़रतें मिट जाएं जिस से,
प्यार की ऐसी बूंदें बरसाओ रे बदरा।।

शायद कबूल तोह हो जाती मेरी भी दुआएं।।
बस टूटते तारों को देख कर कुछ माँगा ही ना गया।।

बेहक जाता हूँ ज़िन्दगी की राहों में बार बार।।
उम्र बीत गयी पर जीने के सलीके नहीँ आये।।

दिलों से पेहचान हो सबकी तब बात बने।।
रंग तोह अक्सर बदल लेते हैं लोग।।

अपना बनाने में उम्र लग जाती है।।
बेगाना तोह लोग पलों में कर जाते हैं।।

मैं रेगिस्तान की धूल की तरह तरसता ही रह गया।।
वोह घटा बनकर आया और गरज कर निकल गया।।

शायद वोह रूठता ना मुझसे।।
जो मैं अपनी नज़रों में थोड़ा सा गिर गया होता।।

पैमाने ज़िन्दगी के एक से रखे हैं सबके लिए।।
दोस्त हो मेरे तोह आम क्या ख़ास क्या।।

एक बार जो आ जाएं रिश्तों में दरारें।।
फिर लाख मरहम लगा लो वोह बात नहीँ बनती।।

Saturday, August 13, 2016

सलीके ज़िन्दगी के

अपने दर्द को छिपाना सीख लिया है मैंने।।
बेवजह मुस्कुराना भी सीख लिया है मैंने।।
वक़्त के सांचे में पिघलना सीख गया हूँ।।
मुश्किल इन राहों पर चलना सीख गया हूँ।।

सुख नहीँ रहे तोह गम भी गुज़र जाएंगे।।
ये पल रोकर काट लेता हूँ फिर तोह तमाम उम्र मुस्कुरायेंगे।।
ज़िन्दगी की उलझनों में खुद को सुलझाना सीख लिया है मैंने।।
कोई समझे ना समझे खुद को समझाना सीख लिया है मैंने।।

अपनों से धोखे खाकर सम्भलना सीख गया हूँ।।
फिसलने का कोई खौफ नहीँ है चलना सीख गया हूँ।।
दुनियादारी के बोझ को उठाना सीख गया हूँ।।
रूठ जाए जो कोई मुझसे तोह मनाना सीख गया हूँ।।

दूसरों को तोड़कर खुदको जोड़ना नहीँ सीखा।।
बुरे हालातों में भी मुंह मोड़ना नहीँ सीखा।।
दोस्ती में कभी फरेब करना नहीँ सीखा।।
एक बार जो डट गया तोह डरना नहीँ सीखा।।

किसी की कमजोरी पर हंसना नहीँ सीखा।।
लाचारों और मजबूरों को डसना नहीँ सीखा।।
इनसानियत से पहले धर्म कभी आते ही नहीँ।।
सोच पर मर जाता हूँ जनाब चेहरे कभी लुभाते ही नहीँ।।

गिरगिट की तरह रंग बदलना नहीँ आया।।
पैसों के लिए रिश्तों को कुचलना नहीँ आया
कितना भी मझबूर हो जाऊं रिश्वतखोरी नहीँ करता।।
भूखा भी सो लेता हूँ पर कभी चोरी नहीँ करता।।

Wednesday, August 10, 2016

शायरी 2

तेरे अस्तित्व पर अक्सर मुझे शक होता है ऐ खुदा।।
जब भी किसी गरीब को भूख से मरते देखता हूँ।।😟

मुझे दफनाने से पहले मेरा दिल निकाल लेना।।
बरसों से इसमें बसता है कोई।।

पूरी तोह हो जाती शायद मेरी भी दुआएं।।।
पर उस तारे को टूटता देख कुछ माँगता भी तोह कैसे।।

तमाम उम्र जोड़ता रहा जो दूसरों को।।
किसी ने सहारा भी ना दिया जब वोह खुद बिखरा।।

हर रोज आकर छंट जाते हैं फिर।।
तेवर बादलों के भी आजकल सरकार जैसे हैं।।

मैं अभी तक ठीक से सिमटा भी नहीँ था।।।
और वोह फिर से आ गए हवाओं का झोंका बनकर।।।

ठिठुरा तोह बहुत था वोह उस बारिश वाली रात में।।
पर उसकी जमीन प्यासी और बच्चे भूखे थे।।😎

कितनी मुश्किलों से तिनका तिनका करके बनाया था उसने अपना आशियाना।।
उस हवा के झोंके ने पल भर में सब तवाह कर दिया।।

अब मेरी कलम भी मेरा साथ नहीँ देती।।
वोह जमाना और था जब मैं भी महफ़िलों को रुलाया करता था।।

वोह देश की खातिर लड़ते लड़ते भी आतंकवादी कहलाया।।
और लोग पलों में टोपी लगाकर ईमानदार हो गए।।😎😎

जी भर कर दीदार करले जब तक मैं हूँ।।
मुसाफिर हूँ ज़िन्दगी का ना जाने कल रहूँ ना रहूँ।।

कब तक रोकेंगे नीर को ये मिट्टी के बाँध।।
इक दिन तोह सैलाब आएगा जरूर।।

जरूरी नहीँ हर राह मन्ज़िल तक पहुंचे।।
कुछ किस्से अधूरे ही रहते हैं।।😑😑😑

ये कागजों की दुनिया है मैडम।।
यहाँ तुजुर्बे कौन देखता है।।

भूखे रहने से जो दुआएं कबूल होती।।
तोह शायद कोई रोटी की तलाश ना करता।।